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Friday, 11 January 2013

किसके लिए



अधरों पर रखे पैमाने
मौन क्‍यों हैं
अश्‍कों से पिला दे साकी
मयखाने किसके लिए हैं ?

बयां यू करते हैं,
हम दिले दास्‍तां
किताबों में लगे पन्‍ने
मौन क्‍यों है
सूखे फूल इसमें
आखिर रखे किसके लिए हैं ?

पतंगों के जलने का सबब
हमसे न पूछो यारों
जल रही बाती मौन क्‍यों है?
मन मंदिर के गलियारे में
आखिर चराग जलाए किसके लिए हैं ?

माथे पर सजी बिंदिया
होठों पर लाली रचाए किसके लिए हैं?
सोलह श्रंगार किए
जूड़े में वेणी,
आखिर लगाए किसके लिए हैं ?

दर्द दिल में छिपाए
झरोखों से झांकती
खामोश जुबां, लरजते होठ
नयनों में भर नीर आए,
आखिर किसके लिए हैं ?
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Thursday, 10 January 2013

प्रणय गीत



व्‍यस्‍तता में लीन
खनकती कलाओं का संगीत
पुकार रहा मुझे
कौन सा प्रणय गीत।

आभास दिलाता
हो कहीं आस-पास
बज रहा
तन्‍हाइयों का संगीत
पुकार रहा मुझे
कौन सा प्रणय गीत।

न रुनझुंन न वो झन्‍कार
चलता है पता न
उसके आने का
लिए बिन घुंघरू की
पायल का संगीत
पुकार रहा मुझे
कौन सा प्रणय गीत।
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Wednesday, 9 January 2013

विक्षिप्‍त मन



विक्षिप्‍त मन से शीशे को
कितना और तोड़ोगे।
बिखरे इन टुकड़ों पर
और कितना चलोगे।
मत रौंदो अब इतना इन्‍हें
जुबां से ये कुछ न बोलेंगे।
हो सके तो इन्‍हें अब बिनवा दो
गर जोड़ न सको तो इन्‍हें अब फिंकवा दो।
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Thursday, 27 December 2012

पतझड़



अब सार्थक होंगी ये सदाएं
दी थी जो अकेलेपन की वीरान गलियों से।
अब आएगी फिर नए अन्‍दाज से बहार,
उजड़ गई थी जो पतझड़ से।
आ रहा बासन्‍ती मौसम
बन कर पूर्वाई
अतृप्‍त धरा की प्‍यास बुझाने।
काली घटा बनकर ले अपनी बदली
उड़ चलेगा पछुवाई बनकर
चीरती बयार इन्‍द्रधनुषी पथ से।
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Tuesday, 25 December 2012

बिन तेरे


बह रही जीवन नैया
अश्‍कों की धार पर
बिन आंचल के पाल के।
किराना कर किनारे से
फंस गए मझदार में,
बिन बांहों की पतवार के।
चल रही आंधियां
लौट गा बसन्‍त भी
सूरज की तपती तेज किरणें
हो गई चंदा की चांदनी भी
बिन शरद की छावं के।
तन्‍हाइयों से जज्‍ब अंधेरों से
गुज रही जिन्‍दगी
जला रही रोशनी
तुम्‍हारी याद के दीपों की,
ऐसे में तक संजोए रखूं
इन दीपों की रोशनी
बिन उजाले अंधेरी छांव के।
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Saturday, 22 December 2012

आ जाओ....


आ जाओ
विरह के मौसम ने
चकरोर बना दिया।
तुम चंदा की
चांदनी बनकर आ जाओ।
मिन की प्‍यास ने
चातक बना दिया
तुम बिन बादल की
बरसात बन कर आ जाओ।
तुन्‍हाई की रात
सोने नहीं देती,
तुम बिन ख्‍वाब की
निंदिया बन कर आ जाओ।
तुम्‍हारी खुरबत
शिकस्‍त दे रही रही है
तुम जीत मेरी
‘’विजय’’ बन कर आ जाओ।
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Thursday, 20 December 2012

सिर्फ एक तेरे दीदार के लिए।


सांस लेना भूल गए
तुम्‍हारी यादों के आंचल में।
सब कुछ खो जाए गर,
पा लूंगा
तुम्‍हारी जुल्‍फ के
घने साए में।
मूँह मोड़ लूं
गर दुनियां से बाबस्‍ता, सिर्फ एक तेरे दीदार के लिए।

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