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Saturday, 15 June 2013

प्रकाश

तू हाथ फैला फिर
उस प्रकाश को
पाने के लिए
जिसने अपने को जला
दूसरों को उजाले
परोसे हैं।
दिया है भरोसा
उस प्रकाश ने
जीवन में हौसला
जगाने के लिए।
हर सुबह उठता है
नई रौशनी लेकर
और दिन भर
बांटता फिरता है
और अस्‍ताचल को
खाली हाथ
लौट जाता है
फिर एक

नई सुबह के लिए।

Monday, 18 March 2013

छोटे-छोटे मुक्‍तक


धूप पीले रंग में रंगी हुई
समय को थामे चला जाता हूँ
हर तरफ बिखरा एक
प्‍यार का अहसास
एक तरफ खड़ा है गुल्मोहर
और दूसरी तरफ है अमलतास।
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कदमों की आहट पर
झनक उठे तेरी पायल
बांधे रहती है हमें।
बिखर जाते हैं हम भी
पायल के घुंघरू के टूटने पर ।।
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इस जमाने के दरमियां हम थे
प्‍यार की तलाश में,
इश्‍क किया बहुत किया
पर जंगली घास सा नजर आता है !!
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आज फिर
उनकी उठी निगाहों का
दीदार हो गया।
पर हम अपनी
नज़रें न झुका सके।।
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सुरमई सांझ का अकेलापन
क्‍या यही है तुम्‍हारा भोलापन
कहां चली तुम लिए यह सुनहरापन
छोड़ मेरे लिए यह अकेलापन
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Sunday, 10 March 2013

तुम्‍हारा रूप



तुम्‍हारा रूप ही
मेरे प्‍यार को
परिभाषित करता है।
तुम्‍हारा रूप ही
मेरे नयनों को प्रचुरता
प्रदान करता है।
तुम्‍हारे रूप की प्रचुरता
एक ठंढक के रूप में
मेरे हृदयांगन में
शीतल चांदनी के रूप में
उतरती है।
तुम्‍हारे ही रूप की
प्रचुरता से आलोकित
होता हृदयांगन और
सैंकड़ों दीपों की रौशनी से
दैदिप्‍यमान होता तन-मन।
आज भी तुम्‍हारा रूप
परिभाषित करता है
भूली-बिसरी यादों को।
तुम्‍हारा रूप इन हवाओं में
कुछ इस तरह घुला
कि यादों के झरोखों पर
पड़ी धूल को धो
फिर निखार दिया
तुम्‍हारे रूप को, 
और
फिर लिखी नई परिभाषा
तुम्‍हारे रूप की।
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Thursday, 21 February 2013

मिल गया



उलझनों के भँवर में
फँसी जिन्‍दगी को
आज फिर एक सहारा मिल गया।

हकीकत से दूर
भागती उम्‍मीदों को
एक मुकाम मिल गया,
अपनों से जिन्‍दगी को
आज फिर एक उपहार मिल गया।

नश्‍तर चुभते
जिस्‍म में
कोई अनचाहा जख्‍म दे गया,
बहती अश्रुधारा
कराहती जिन्‍दगी में
आज फिर कोई मरहम दे गया।

पुल्कित से मन को
नया परवाज मिल गया,
फैले नील गगन में
आज फिर क्षितिज पर एक सितारा मिल गया।

अंधेरों में भटकते
अरमानों के कदम,
उदास आंखों को
आज फिर एक ख्‍वाब मिल गया।
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Tuesday, 19 February 2013

नीम तले



नीम तले
रेशमी जुल्‍फों की छांव में
छनती सुनहरी धूप
तुम्‍हारी बाहों में।

बहती पुरवाई
नरम धूव पर
एक सुकून की तलाश
तुम्‍हारे मखमली आंचल में।

पल-पल गुजरता गया
अनजानी सी चाह लिए
एक सन्‍नाटा
घड़ी की चाल में।

सुलगती सी दोपहर
मुरझाई सी शाम
नहला गई चांदनी
सियाह रात में।

न सुर सजे
न साज बजे
खूब सजी महफिल
तुम्‍हारी इन अदाओ में।

न वो नज़र आए
न आने की खबर
उदासी ओढ़ चली
इन विरान राहों में।

धूप इन्‍तजार करती रही
कहीं छांव तो आए
उनके आने की खबर
हो इन हवाओं में।

थकी निगाहें
पथ पर, पथिक पर
भीड़ में एक चेहरा
नज़र तो आए
इन निगाहों में।

हवा का एक झौंका
थी खबर उनके आने की
एक झलक और ओझल हो गई
मेरी गली की इन राहों में।
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Monday, 18 February 2013

रंगों का त्‍यौहार



लो आया बसंत
झूंम उठा अमलतास
फिजाओं की मिठास
लो आया रंगों का त्‍यौहार।

फाल्‍गुनी बयार ने
बिखेरा अबीर-गुलाल
तन-मन रंग लो
न रहे कोई मलाल
लो आया रंगों का त्‍यौहार।

ये गलियां और चौबारा
रंगों से है सराबोर
मस्‍तानों की टोली
खड़ी है तेरे द्वार
लिए अबीर-गुलाल
लो आया रंगों का त्‍यौहार।

रखना संभाल
कोरा आंचल, गोरे गाल
राह तक रही होगी
बाहें फैलाए
लिए अबीर-गुलाल
लो आया रंगों का त्‍यौहार।

नाचे मन मयूर
झूम उठे तन-मन
भीगे चोली और दामन
लिए उमंग और प्‍यार
लो आया रंगों का त्‍यौहार।

रंगों से निखरेगा
रूप और तेरा यौवन
संकुचाई सी देगी
मौन स्‍वीकृति
उढ़ेलने को रंगों भरा दुलार
लो आया रंगों का त्‍यौहार।
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