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Monday, 17 December 2012

विजय


तुम जहां हो
मैं वहां कहां
समय की दीवार खड़ी
इन्‍तजार की बेडि़या डाल।
दूरियों की पराधिनता में कैद
हर पल रूका हुआ,
पर जारी है जिन्‍दगी का सफर
फांसले कम हो रहे हर पल
पर युग-युग से बीत रहे हैं।
मंजिल पास है पर करीब नहीं
राहें हैं पर साथी नहीं,
कट न सकेगा यूं सफर
पर ऐसे में कहां मिलेगी ‘’विजय’’
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3 comments:

  1. बहुत सुंदर क्या बात हैं ......

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  2. लाजवाब , बहुत शानदार रचना

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