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Saturday, 15 December 2012

रात का सौदागर


रात कितना रोई तुम्‍हें ना पाकर
मन को घरोदें में छिपे क्‍यों रहते हो तुम
दिन बीत गया निशा के द्वार तक
ख्‍वाब अस किसके लिए चुराऊं।
रात भी बीत गई
अखियों के झरोखे से भी न आए तुम
शयन शैया तुम्‍हारे स्‍वप्‍नों से भरी कहां
जो अपनी आंखों में बसाऊं।
तरसा दिया-तड़पा दिया
मोहताज कर दिया सपनों के सौदागर को
चल पड़ा वो बन कर सपनों का सौदागर
गया खरीदने ख्‍वाबों की एक कली
न थे लताओं पर फूल।
कुछ सींचा, कुछ पाला
तैयार कर ख्‍वाबों की बगिया
ले चला न जाने कौन अपना बना
ख्‍वाबों की उस कली को।

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