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Sunday, 17 February 2013

उठी निगाह रोई-रोई सी



रूमानी हुई लेखनी
कलम खूब रोई
आंसूओं सी बिखर गई
स्‍याही कागज से कोरे आंचल पर।
रूक गई आहिस्‍ता से
फिर चली बंजर जमीं पर
घबराई सी कोरे कागज पर।
दृवित हुआ मन
सदाएं देती खामोश सी
शुष्‍क अधरों पर
वाणी भी कपकापाई सी।
पुलक्ति  हुआ मन
आंखों में रूलाई सी
इबारत को दोष देती
उठी निगाह रोई-रोई सी।
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