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Friday, 12 October 2012

सूनी गली के बंद दरवाजे


बन्‍द है जाने के तमाम रास्‍ते
लौट आती है जाकर ये हवाएं
बिन दस्‍तक दिए तुम्‍हारे दरवाजे।
बहारों में हलचल भी नहीं
भंवरों का गुन्‍जन भी बन्‍द है।
शून्‍य गगन में विचरते पंछी नहीं,
चहकना भी उनका बन्‍द है।
बेबस खड़ा हूं तेरी गली में
खुशियों/अरमानों से लदा,
राहगीर बिन सूनी गलियां है तेरी
दरवाजे भी सभी बन्‍द है।
होगा कोई बोझ
हल्‍का करने के लिए,
थक कई तलाशते
अपनों को निगाहे अब
पलके की निठाल बेजान सी बंद है।
नजर कोई आता नहीं
यहां विरान खण्‍डहर हैं
इस गली के मकां सभी बन्‍द हैं।
बीत न जाए‍ जिन्‍दगी
खड़े-खड़े यहां,
चारों तरफ यहां
पसरा भ्रम ही भ्रम है 
! लौट चलें....
सूनी गली के दरवाजे सभी बंद है।

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