Click here for Myspace Layouts

Saturday, 20 October 2012

श्रंगार रस



भरे कांच के गिलास में,

ये क्‍या श्रंगार रस मिला दिया।

अधरों तक पहुंचा भी नहीं

श्रंगार से परिपूर्ण नजर

तेरा रूप आया।

प्‍यास बुझा न पाऊं,

मर कहीं न जाऊं

चाह कर भी पिया न गया

रूपामृत भी ज़हर नज़र आया।

----

Friday, 19 October 2012

मानव रत्‍न


दुनियां की भीड़ में,
तलाशता मानव रत्‍न।
मिला न कोई,
मिला तो सिर्फ एक
मानव रत्‍न।
तराशा जिसे अपनी
चारित्रिक अंगुलियों से।
चमकाया अपनत्‍व की
पालिश से जिसे।

रास न दुनियां को आया

चमक बिगाड़ने पर तुली

हथियाने की कोशिश में।

बन्‍द यादों की डिबियां में,

मन की तिजोरी में रख्‍

संभाला मानव रत्‍न।

-----

Thursday, 18 October 2012

दुनियां के लिए

अपनी दोनों आंखों के,
सपने दे दो मुझे।
खुशियां तुम जमाने भर की,
जिन्‍दगी से मेरी ले लो मुझसे।
न करना गिला अपनों से,
सहारा अपनों का ले लो मुझसे।
न देखो जमाने की तरफ
रफ्तार वक्‍त की बहुत है।
देखो निगाहों से मेरी,
दुनिया की टोक बहुत है।
बनाना दुनियां को अपना है,
शक का पर्दा हटा दो
अपने लिए नहीं दुनियां के लिए।
----

Wednesday, 17 October 2012

यादों का सफ़र


यादों के साए में

तमाम उम्र गुज़ार दूं,

याद में तेरी आंखों के क्‍या

लहू का एक एक कतरा भी लुटा दूं।

भुला न सका तेरी याद का,

एक एक पल सुबह शाम के नाम का

मिटा दूंगा हर एक अक्षर

तेरे लिए अपने नाम का।

यादों के इस बोझ को लिए

तय कब तक करना होगा

सफ़र जिन्‍दगी का

लिए सहारा तेरे नाम का।

सहनी कब तक होगी,

सह कर भी न सही जाती

भुलाए नही भूलती तेरी यादें,

शेष रह जाती है

तब भी जिन्‍दगी में

छुपाए नहीं छुपती

अपनों में भी कहां,

तलाश लेती हैं

आकर मुझे यहां तेरी यादें।

यादों के सुनहरे मोती

बंधी हुई है

प्रीत के तार में

याद बस रहे

बिखर न जाए

तेरी यादों की ये लड़ी।

-----

Tuesday, 16 October 2012

अब अन्‍धकार न देना


एक दिन हम साथ होंगे।
जिन्‍दगी को साथ निभाएंगे।।
तेरे लिए हर दिन नया लाएंगे ।।।
तुझे एक नज़र देखेंगे,
अपनी तसल्‍ली के लिए।

मालूम है देखते ही रूठ जाओगी,
एक बार फिर मनाएंगे
आने वाली जिन्‍दगी के लिए।।

सुबह का कोहरा यूं छटने लगा,
सामने चेहरा तुम्‍हारा यूं दिखने लगा।
चांद दूज का दिन में जैसे दिखने लगा।।

तेरे नूर पर है सुबह की लालिमा
याद दिलाती है आने वाले कल की
इन्‍तज़ार है उस पल का, कब होगा मिलन
आने वाली सुबह का।

कत्‍ल तूने किया जिगर
इसलिए मैं कातिल हूं,
गुनाह तूने किया
इसलिए मैं गुनहगार हूं,
बरी तूने कराया,
इसलिए मैं निर्दोष हूं।

आंखों के तेरे दो मोती
टिमटिमाते तारे नील गगन में,
रोशनी तुम्‍हीं ने दी
शमा को रौशन किया
अब उसे बुझाकर
अन्‍धकार न देना।

नज़रों के झुरमुट से गुजरता हूं मैं
एक नज़र टकरा जाती है मुझसे,
दुनिया की चकाचौंध में
एक शमा टकराती है मुझसे।

दीप कई पर ज्‍योति एक
वाणी एक मुख अनेक
चेहरे कई पर
पहचान एक।
-----