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Thursday, 8 November 2012

क्षणिकाएं...



दूरियां की काफी दी,
एक झलक पाने के लिए।
नजदीकियां तो और भी
तरसा देंगी एक झलक पाने के लिए।
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आँखों के तरकश में
अनगिनत तीर नयनों के,
चढ़े पलकों की कमान पर है,
झेलने वाला कोई नहीं
आओ इन्‍हें उतार दें।
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Wednesday, 7 November 2012

स्‍वप्‍नों की टोली



निशा खड़ी द्वार पर,
स्‍वप्‍नों की टोली लिए,
निद्रा के आलिंगन में डूबी
अधरों पर मन्‍द मन्‍द खिलती
कलियों की सी मुस्‍कान लिए,
आने दो-आने दो स्‍वप्‍नों की सौगात
इन दो नयनों समाने के लिए,
कौन-कहां-क्‍या इसमें 
बस की मेरे बात नहीं 
खो जाओ इसमें तुम परमानन्‍द के लिए
खेलो-खेलो संग मेरे
मिल जाऊँ गर तुम्‍हें यहां
मेरे संग दुनियां को भूल जाने के लिए,
कितना खेले, कितना सताया,
मुझे भी याद नहीं कैसे खेले
वो रात भी बैचेन अब सब जानने के लिए

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Saturday, 3 November 2012

कशिश


न जाने कौनसी
अनजानी सी खुशबू
कशिश जिसकी खींच जाती है
तुम्‍हारे यहां।
एक वक्‍त ऐसा भी आएगा
चाहत के बहते समन्‍दर में 
तड़पता छोड़ जाओगे मझधार में,
यादों की मौजों की चोट 
सहने के लिए।
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Friday, 2 November 2012

करवा चौथ



सुबह की लालिमा
बिखेरने लगी सुनहरी किरणें
बन्‍द कमरों के झरोखों से
सुनहरे दिन का आगाज करती है।

उठना एक अलसाई सी
अलहड़ नवयोवना का
सृजन करती
नई आशाओं और विश्‍वास का
पूजा की थाली सजाती है।

शरद चांदनी की किरण से
रोशन हुआ तेरा नूर
पूनम के चांद का अहसास करती है।

श्‍वेत शीतल चाँदनी ने
ओढ़ाई श्‍यामल बदन पर
एक मखमली चादर
सपनों की परी सा अहसास करती है।

सब दिन जिया जिसकी याद में
निशा के घिर आने तक
निरजल तरसती एक बूंद के लिए
प्रियतम के लिए चाँद की चकोर बन जाती है।

ढूंढती बादलों की ओट से
चाँद में अपने प्रीतम को
बेताब सजी धजी पगलाई सी
अर्ग दे दोनों हाथों से
दीर्घायु की कामना करती है।

सजल हो प्रियतम के हाथों
बाहों में सिमट जाती है
करवा चौथ की ये रात हर साल आती है।
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Thursday, 1 November 2012

उपवन


सदियों से सींचते आए जिसे
आजादी के उपवन को,
न ले सके जायका वे
इस फलित उपवन का,
उपवन जो छोटा सा बना गए।
सजा भिन्‍न भिन्‍न फल-फूलों से
खुशियों की बहारों से आबाद,
न जाने भेंट चढ़ा कैसे उपवन
ढोलते मनचले दरिंदे भंवरों के,
आमादा इसका रस चूसने को हैं।
अपंगता का जामा पहने
विवश्‍ता लिए क्‍या करे माली,
रौंद रहे वो देखो
पहरेदार भी सो रहा है,
जनता तमाशा देख रही है।
धमकी भय की बाढ़ लगा
अपने स्‍वार्थी पेट के लिए,
वह निर्दोषों की दुनियां उजाड़ रहा
मंदिर मस्जिद नहा गए
अपवित्रता के कुंड में,
कितना गन्‍दा मैला कर दिया
उपवन की माटी को,
पवित्रता इसकी न जाने कहां गई।
उस ''संजय'' की आंखें कहां
तलाश जो सके बदली ऐसी,
जो उपवन का इतिहास लौटा सके।
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