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Sunday, 13 January 2013

कुछ नया



वक्‍त काली स्‍याही
कुछ लिख गई
जीन के कोरे कागज पर
किताबों को संवारते-संवारते
गुजर गया दो जवां दिलों को
मिलने का वो साल....

फिर चमके जुगनूं
गहराई अंधेरी रात में
भोर हुई फैला उजियाराा
मिटा तिमिर जीवन का
कुछ नया लिखने को....

फिर उठी अंगुलियां
तेरे शाने पर
बिखरी जुल्‍फें संवारने को
हाथों में तेरा चेहरा
गुलाब की तरह लेने को....

बांहें फैला दी
तेरे साथ लचने को
दो कदम चलकर देखा
डगर पुरानी थी,
चुनने हैं काँटे
तेरी राहों से
नर्इ मंजिल पाने को....
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Friday, 11 January 2013

किसके लिए



अधरों पर रखे पैमाने
मौन क्‍यों हैं
अश्‍कों से पिला दे साकी
मयखाने किसके लिए हैं ?

बयां यू करते हैं,
हम दिले दास्‍तां
किताबों में लगे पन्‍ने
मौन क्‍यों है
सूखे फूल इसमें
आखिर रखे किसके लिए हैं ?

पतंगों के जलने का सबब
हमसे न पूछो यारों
जल रही बाती मौन क्‍यों है?
मन मंदिर के गलियारे में
आखिर चराग जलाए किसके लिए हैं ?

माथे पर सजी बिंदिया
होठों पर लाली रचाए किसके लिए हैं?
सोलह श्रंगार किए
जूड़े में वेणी,
आखिर लगाए किसके लिए हैं ?

दर्द दिल में छिपाए
झरोखों से झांकती
खामोश जुबां, लरजते होठ
नयनों में भर नीर आए,
आखिर किसके लिए हैं ?
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Thursday, 10 January 2013

प्रणय गीत



व्‍यस्‍तता में लीन
खनकती कलाओं का संगीत
पुकार रहा मुझे
कौन सा प्रणय गीत।

आभास दिलाता
हो कहीं आस-पास
बज रहा
तन्‍हाइयों का संगीत
पुकार रहा मुझे
कौन सा प्रणय गीत।

न रुनझुंन न वो झन्‍कार
चलता है पता न
उसके आने का
लिए बिन घुंघरू की
पायल का संगीत
पुकार रहा मुझे
कौन सा प्रणय गीत।
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Wednesday, 9 January 2013

विक्षिप्‍त मन



विक्षिप्‍त मन से शीशे को
कितना और तोड़ोगे।
बिखरे इन टुकड़ों पर
और कितना चलोगे।
मत रौंदो अब इतना इन्‍हें
जुबां से ये कुछ न बोलेंगे।
हो सके तो इन्‍हें अब बिनवा दो
गर जोड़ न सको तो इन्‍हें अब फिंकवा दो।
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